मँह-मँह बेल कचेलियाँ,

Namvar SinghNamvar Singh28 Jul 1926 – 19 Feb 2019

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मँह-मँह बेल कचेलियाँ, माधव मास
सुरभि-सुरभि से सुलग रही हर साँस
लुनित सिवान, सँझाती, कुसुम उजास
ससि-पाण्डुर क्षिति में घुलता आकास

फैलाए कर ज्यों वह तरु निष्पात
फैलाए बाहें ज्यों सरिता वात
फैल रहा यह मन जैसे अज्ञात
फैल रहे प्रिय, दिशि-दिशि लघु-लघु हाथ !

मँह-मँह बेल कचेलियाँ, माधव मास
सुरभि-सुरभि से सुलग रही हर साँस
लुनित सिवान, सँझाती, कुसुम उजास
ससि-पाण्डुर क्षिति में घुलता आकास

फैलाए कर ज्यों वह तरु निष्पात
फैलाए बाहें ज्यों सरिता वात
फैल रहा यह मन जैसे अज्ञात
फैल रहे प्रिय, दिशि-दिशि लघु-लघु हाथ !

 

Namvar Singh
About the poet

Namvar Singh

Namvar Singh (28 July 1926 – 19 February 2019) was an Indian literary critic, linguist, academician and theoretician. He received his doctorate degree from Banaras Hindu University where he also taught for some time. He served as a professor of Hindi literatu…

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