Selected Quotes
Poetry & Stories
चरचा करी कैसे जाय - नागरीदास
चरचा करी कैसे जाय।बात जानत कछुक हमसों, कहत जिय थहराय॥
ताननि की ताननि मही - नागरीदास
ताननि की ताननि मही, परयौजुमन धुकि धाहिं।पैठयो रव गावत स्त्रवनि, मुख तैं निसरत आहि॥
बोलनि ही औरैं कछू - नागरीदास
बोलनि ही औरैं कछू, रसिक सभा की मानि।मतिवारे समझै नहीं, मतवारे लैं जानि।
जहाँ कलह तहँ सुख नहीं - नागरीदास
जहाँ कलह तहँ सुख नहीं,कलह सुखन को सूल.सबै कलह इक राज में,राज कलह को मूल.
देख्यो श्रीवृंदा विपिन पार - नागरीदास
देख्यो श्रीवृंदा बिपिन पार बिच बहति महा गंभीर धार .नहिं नाव,नहिं कछु और दाव हे दई !कहा कीजै उपाव.
नागरीदास: Quick Answers
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Kavishala has 10 poems and stories by नागरीदास, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by नागरीदास
चरचा करी कैसे जाय - नागरीदास
चरचा करी कैसे जाय।बात जानत कछुक हमसों, कहत जिय थहराय॥
ताननि की ताननि मही - नागरीदास
ताननि की ताननि मही, परयौजुमन धुकि धाहिं।पैठयो रव गावत स्त्रवनि, मुख तैं निसरत आहि॥
बोलनि ही औरैं कछू - नागरीदास
बोलनि ही औरैं कछू, रसिक सभा की मानि।मतिवारे समझै नहीं, मतवारे लैं जानि।
जहाँ कलह तहँ सुख नहीं - नागरीदास
जहाँ कलह तहँ सुख नहीं,कलह सुखन को सूल.सबै कलह इक राज में,राज कलह को मूल.
देख्यो श्रीवृंदा विपिन पार - नागरीदास
देख्यो श्रीवृंदा बिपिन पार बिच बहति महा गंभीर धार .नहिं नाव,नहिं कछु और दाव हे दई !कहा कीजै उपाव.
काहे को रे नाना मत सुनै तू - नागरीदास
काहे को रे नाना मत सुनै तू पुरातन के,तै ही कहा ? तेरी मूढ़-गूढ़ मति पंग की.
जौ मेरे तन होते दोय - नागरीदास
जौ मेरे तन होते दोय.मैं काहू ते कुछ नहिं कहतो,मोते कछु कहतो नहिं कोय.
चरन छिदत काँटेनि तें - नागरीदास
चरन छिदत काँटनि ते स्रवत रुधिर सुधि नाहिं .पूछति हौं फिरि हौं भटू खग मृग तरु न माहिं .
सब मजहब सब इल्म - नागरीदास
सब मजहब सब इल्म अरु सबै ऐश के स्वाद.अरे इश्क के असर बिनु ये सबही बरबाद .
भादों की करि अँध्यारि - नागरीदास
भादों की कारी अन्ध्यारी निसा झुकि बादर मंद फुही बरसावै .स्यामा जू आपनी ऊची अटा पै छकी रसरीति मलारहि गावै .
Selected Quotes by नागरीदास (चुनिंदा उद्धरण)
देख्यो श्रीवृंदा बिपिन पार बिच बहति महा गंभीर धार .नहिं नाव,नहिं कछु और दाव हे दई !कहा कीजै उपाव.चरचा करी कैसे जाय।बात जानत कछुक हमसों, कहत जिय थहराय॥जहाँ कलह तहँ सुख नहीं,कलह सुखन को सूल.सबै कलह इक राज में,राज कलह को मूल.जौ मेरे तन होते दोय.मैं काहू ते कुछ नहिं कहतो,मोते कछु कहतो नहिं कोय.भादों की कारी अन्ध्यारी निसा झुकि बादर मंद फुही बरसावै .स्यामा जू आपनी ऊची अटा पै छकी रसरीति मलारहि गावै .ताननि की ताननि मही, परयौजुमन धुकि धाहिं।पैठयो रव गावत स्त्रवनि, मुख तैं निसरत आहि॥Videos on नागरीदास
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