राख

Mohan RanaMohan Rana9 Mar 1964

2 min read · 12.6K reads


शांति मार्च के बाद फिर शुरू हो गये दंगे

बस यही ख़बर है


मैं क्या कर सकता था

मै कर रहा हूँ

मैं क्या करूँगा


चुप रहूँगा

सुनता रहूँगा

देखता रहूँगा


चलता रहूँगा

लगातार कभी न समाप्त होनेवाली यात्रा में

बातचीत अपने आपसे

अपने अनाम-परनाम मुखौटों से


झरते हैं अमलतास के फूल

गरम हवा में कुम्हलाते

और मैं उन्हें चुनता हूँ धूल में

राख हो चुके

थोड़ी देर में चल पड़ेंगे साथ धूल की आँधी के


क्या मैं जो बुरा है उसे बुरा कहूँगा

क्या मैं लडूँगा

क्या मैं कुछ करूँगा

रोककर पूछूँगा लौटते हुए हत्यारे से

इस सबका क्या कोई मतलब है

क्या वो मनुष्य न था जो अब नहीं लौटेगा घर अपने तुम्हारी तरह

वह अध्यापक था

वह साइकिल पर निकला कामगार था

और यही सोचते कर लूँगा पार

भारी यातायात को


मैं क्या करूँगा

तूम पूछते हो

मैं पूछता हूँ आप से


खोजूँगा लापता नामों को

या बस लिख दूँगा वक्तव्य विरोध का

मृतकों की ओर से

 

Mohan Rana
About the poet

Mohan Rana

Mohan Rana (Hindi: मोहन राणा; born 9 March 1964) is a Hindi language poet from India. He has published eight poetry collections in Hindi. His poems have been translated and published by the Poetry Translation Centre. Literary career :- The poet and critic, Na…

View profile & all 22 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like