हम सुनेंगे तुम्हारे स्वरों को चुपचाप
रिमझिम में भीगते
धोते अपने अंतर को उनकी धारा में,
बारिश चली जाएगी
अनजाने अंतरालों में
समेटते स्मृतियों की कतरनों में
जाने कब से दम साधे बोल पड़ती अनुगूँज दोपहर की
तुम्हें सुनते सुनते
हम सुनेंगे तुम्हारे स्वरों को चुपचाप
रिमझिम में भीगते
धोते अपने अंतर को उनकी धारा में,
बारिश चली जाएगी
अनजाने अंतरालों में
समेटते स्मृतियों की कतरनों में
जाने कब से दम साधे बोल पड़ती अनुगूँज दोपहर की
तुम्हें सुनते सुनते

Mohan Rana (Hindi: मोहन राणा; born 9 March 1964) is a Hindi language poet from India. He has published eight poetry collections in Hindi. His poems have been translated and published by the Poetry Translation Centre. Literary career :- The poet and critic, Na…
View profile & all 22 Poems / Storiesकाले रंग को पहचानना असंभव होता हैसब ओर जब अंधकार हो
आकाश को ताकतेमैं नज़र रखे हूँ
मुझे नहीं मालूमनहीं मालूम कि तुम जानना क्या चाहते हो !
वे नहीं देखते बुरावे नहीं सुनते बुरा
उस पर विविध भारती और समाचार सुनते घर पुराना हो गयाउसके साथ ही ऊँची नीची आवाज़ें कमजोर तरंगें