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तुम जो लठैत गोपालक हुरियार रात्रिचर

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तुम जो लठैत गोपालक हुरियार रात्रिचर
तुम जो राज्यश्यालकों के मसिजीवी श्यालक कुलीन और तुम
अर्थात् विप्र भूसुर भूमार
और तुम जो राजन्यश्री बेइमान शक-हूण संतान।

तुम रक्खो इस धरा को अपने पास
कपट की रचना करो गरल की खेती करो
गंगातट अफीम खूब होती है
बाँटो अहिफेन जीभर
तुमको मुबारक हो
यह पुण्यभूमि शस्यश्यामल।

मैं तो
आदिम मर्म बेदना का एकान्त साक्षी हूँ
मैं उन कठोर करुमोर तीक्ष्ण दंत शिलाओं के बीच
हरीतिमा वर्जित उस भूमि पर रहते हुए
तुम्हारे कूट पाशों के प्रतीक करूँगा उद्घाटित
लिखूँगा हजार हजार वर्षों की संचित सुलगती
मार्मिक व्यथा का काव्य अरण्यमर्मर तालपत्रों पर
लिखूँगा मैं
हजार-हजार वर्षों से उनके टपके श्रमजल और रक्त से
अलंकृत उन्हीं की वेदना का काव्य जिन्होंने
बाहुयुद्ध करके तुम्हारी इस शस्यश्यामलधरा को
उद्घाटित किया था कभी; मैं लिखूँगा
आदिम श्वापदों, नर खादकों, मधुकैटभों से
हजार-हजार वर्ष जूझ इस मेदनी का उद्धार करने वाले
उन श्यामलगौरकाय दो पुरुषों की कथा
आदिम अरण्य से उनका बाहुयुद्ध
और उनकी हरीभरी महाकाव्यों की खेती

और इस कथा को हवा की गतिमान डाक
बाँट आयेगी।
उन्हें जो मेरे सहयोगी हैं बन्धु हैं
मेरे हृदय के टुकड़े हैं रामश्याम मोहन को
नाम वाले को, अनामा को
यह कथा हवा की डाक बाँट आयेगी
वे सबके सब साधारण जन
इस इतिहास की आदिम वेदना का मर्म समझेंगे
अर्थ गुनेंगे और विकल हो उठेंगे,
उनके अवरुद्ध पग-बाहु और कंठ।

उन ऊँची तीक्ष्ण शिलाओं के बीच मैं
करूंगा वास। त्याज्य है मेरे लिए हरित भूमि।
क्योंकि गंगा के शस्य भरे खेतों में विचरता है
शैतान! सरीसृप रूप धारण कर ग्रीष्म की
हवाओं में शाप मँडराता है आदिगन्त।

शोभा के मायामय शोभातट पर हरितश्याम
जम्बू शाखाओं में पातक छिपा बैठा है
लिच्छवियों की भूमि में अवदमित
प्रेतों का विहार है।

तो बन्धुओं रह जाऊँगा निर्वासित
उन तीक्ष्ण नुकीली कठोर शिलाओं की गोद में
लिखूँगा सूखे ताल-पत्रों पर वह असहाय कथा
जो शताब्दी दर शताब्दी पराजित होती रही
नये-नये भण्डों, धूर्तों, निशाचरों की नित नयी संहिताओं से।
और सही आदमी रहेगा सदैव पाँत का आखिरी आदमी
लिखूँगा वह असहाय कथा
जो एक दिन सृष्टि का जयगान बन जायेगी।

ये सूखे तालपत्र बोलेंगे बोल जो सहस्त्र कण्ठ बाहुओं में
उतरकर, एक जीवधारी शब्द बन जायेंगे।

 

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Sootradhar