ये चाँद इतना निढाल क्यूँ है ये सोचता हूँ

Kashmiri Lal ZakirKashmiri Lal Zakir7 Apr 1919 – 31 Aug 2016

1 min read · 12.8K reads

ये चाँद इतना निढाल क्यूँ है ये सोचता हूँ

ये चाँदनी को ज़वाल क्यूँ है ये सोचता हूँ

मुझे तो उस का मलाल था वो जुदा हुआ था

उसे भी उस का मलाल क्यूँ है ये सोचता हूँ

अगर जुदाई की लज़्ज़तें ही अज़ीज़-तर हैं

तो मुझ को फ़िक्र-ए-विसाल क्यूँ है ये सोचता हूँ

मिरे फ़साने अवाम को भी पसंद क्यूँ हैं

तिरे करम का कमाल क्यूँ है ये सोचता हूँ

अगर मोहब्बत में सारे रिश्तों की अज़्मतें हैं

तो दुश्मनी का सवाल क्यूँ है ये सोचता हूँ

Kashmiri Lal Zakir
About the poet

Kashmiri Lal Zakir

Kashmiri Lal Zakir (7 April 1919 – 31 August 2016) was an Indian poet, novelist, dramatist and short story writer of Urdu literature. His career—which started with his first ghazal published in Adabi Duniya, a publication from Lahore, in the 1940s—encompasses…

View profile & all 4 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like

मुनव्वर राना के शेरअब जुदाई के सफ़र को मिरे आसान करोतुम मुझे ख़्वाब में आ कर न परेशान करो— मुनव्वर रानातुम्हारे जिस्म की ख़ुश्बू गुलों से आती हैतुम्हारे जिस्म की ख़ुश्बू गुलों से आती हैख़बर तुम्हारी भी अब दूसरों से आती है— मुनव्वर रानाक्या ऐसी स्त्री को जानते हैंहम प्रेम नहीं करतेयानी हमारी भावनाएँ आत्मघाती नहीं हैं— हरे प्रकाश उपाध्यायकुछ नहीं चाहने वाली लड़कीसोलह की यह लड़की दो-तीन साल पहले तकपेड़-पौधों पर रखती थी पाँव— ऐश्वर्य राजदर्दनाक घटनाएँदर्दनाक घटनाओं पर कविता नहीं लिखी जा सकती,संभव ही नहीं है।— फ़रीद ख़ाँमेरे शहर के हैं सवाल कुछन खाता न बही हैजो तुम बोलो, वही है— हिमांशु बाजपेयी