मिरी जवानी बहारों में भी उदास रही
फ़ज़ा-ए-दर्द-ए-तमन्ना को रास आ न सकी
ख़ुशी उफ़ुक़ पे खड़ी देखती रही मुझ को
उसे बुला न सका, ख़ुद वो पास आ न सकी
मिरी जवानी बहारों में भी उदास रही
फ़ज़ा-ए-दर्द-ए-तमन्ना को रास आ न सकी
ख़ुशी उफ़ुक़ पे खड़ी देखती रही मुझ को
उसे बुला न सका, ख़ुद वो पास आ न सकी

Kashmiri Lal Zakir (7 April 1919 – 31 August 2016) was an Indian poet, novelist, dramatist and short story writer of Urdu literature. His career—which started with his first ghazal published in Adabi Duniya, a publication from Lahore, in the 1940s—encompasses…
View profile & all 4 Poems / Storiesये और बात कि आगे हवा के रक्खे हैंचराग़ रक्खे हैं जितने जला के रक्खे हैं
ये चाँद इतना निढाल क्यूँ है ये सोचता हूँये चाँदनी को ज़वाल क्यूँ है ये सोचता हूँ
शबनम में चाँदनी में गुलाबों में आएगाअब तेरा ज़िक्र सारी किताबों में आएगा