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रहा पेश-ए-नज़र हसरत का बाब अव्वल से आख़िर तक

Josh MalsiyaniJosh Malsiyani
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रहा पेश-ए-नज़र हसरत का बाब अव्वल से आख़िर तक

पढ़ी किस ने मोहब्बत की किताब अव्वल से आख़िर तक

इशारा तक न लिक्खा कोई उस ने रब्त-ए-बाहम का

बहुत बे-रब्त है ख़त का जवाब अव्वल से आख़िर तक

मयस्सर ख़ाक होता ज़िंदगी में लुत्फ़-ए-तन्हाई

रहे दो दो फ़रिश्ते हम-रिकाब अव्वल से आख़िर तक

ख़ुशी में भी मोहब्बत दुश्मन-ए-सब्र-ओ-सकूँ निकली

रहा दिल में वही इक इज़्तिराब अव्वल से आख़िर तक

ग़लत-कोशी की आदत ने असर पैदा किया ऐसा

ग़लत निकला गुनाहों का हिसाब अव्वल से आख़िर तक

मुझे ले आई है उम्र-ए-रवाँ किन ख़ारज़ारों में

हुआ है चाक दामान-ए-शबाब अव्वल से आख़िर तक

मजाल-ए-गुफ़्तुगू पाई तो अब क्यूँ मोहर-बर-लब है

सुना दे ओ दिल-ए-ग़फ़लत-मआब अव्वल से आख़िर तक

अँधेरे में तलाश-ए-दिल अगर होती तो क्या होती

शब-ए-तारीक था दौर-ए-शबाब अव्वल से आख़िर तक

दहान-ए-ज़ख़्म से भी 'जोश' हाल-ए-दिल सुना देखा

नमक-पाशी ही था उन का जवाब अव्वल से आख़िर तक

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