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बंदा-ए-मोहर-ब-लब हूँ मैं सना-ख़्वाँ तेरा

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बंदा-ए-मोहर-ब-लब हूँ मैं सना-ख़्वाँ तेरा

दिल में रहता है मुक़फ़्फ़ल ग़म-ए-पिन्हाँ तेरा

ज़िंदगी कुछ भी नहीं सोज़-ए-मोहब्बत के बग़ैर

आग उस दिल को लगे जो नहीं ख़्वाहाँ तेरा

क़ुल्ज़ुम-ए-इश्क़ के तूफ़ान से बचना मालूम

ऐ दिल-ए-ज़ार अब अल्लाह निगह-बाँ तेरा

क्यूँ गुल-ए-तर को मैं आईने से तश्बीह न दूँ

इस में आता है नज़र चेहरा-ए-ख़ंदाँ तेरा

हौज़-ए-कौसर भी हो उस जाम पे सदक़े सौ बार

जिस में मुझ को नज़र आए रुख़-ए-ताबाँ तेरा

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Sootradhar