यात्री मन

Jagdish GuptJagdish Gupt1 Jan 1924 – 16 May 2001

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छल-छलाई आँखों से
जो विवश बाहर छलक आए
होंठ ने बढ़कर वही
आँसू सुखाए
सिहरते चिकने कपोलों पर
किस अपरिभाषित
व्यथा की टोह लेती
उंगलियों के स्पर्श गहराए।

हृदय के भू-गर्भ पर
जो भाव थे
संचित-असंचित
एक सोते की तरह
फूटे बहे,
उमड़े नदी-सागर बने
फिर भर गए आकाश में
घुमड़ कर
बरसे झमाझम
हो गया अस्तित्व जलमय

यात्रा पूरी हुई, लय से प्रलय तक,
देहरी से देह की चलकर, हृदय तक।

एक दृढ़ अनुबंध फिर से लिख गया।
डूबते मन को किनारा दिख गया ।।

Jagdish Gupt
About the poet

Jagdish Gupt

Jagdish Gupt (Hindi: डा. जगदीश गुप्त) (1924–2001) was a well-known poet of the Nayi kavita (नई कविता) generation, a period of Modernism in modern Indian Hindi poetry. He was chairman of the Department of Hindi at Allahabad University. Jagdish Gupta was born i…

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