उगी गोरे भला पर बेंदी

Jagdish GuptJagdish Gupt1 Jan 1924 – 16 May 2001

1 min read · 12.6K reads

उगी गोरे भला पर बेंदी!
एक छोटे दायरे में लालिमा इतनी बिथुरती,
बांध किसने दी।

नहा केसर के सरोवर में,
ज्यों गुलाबी चांद उग आया।
अनछुई-सी पाँखुरी रक्ताभ पाटल की,
रक्तिमा जिसकी, शिराओं के
सिहरते वेग में,
झनकार बनकर खो गई।
भुरहरे के लहकते रवि की
विभा ज्यों फूट निकली,
चीरती-सी कोर हलके पीत बादल की,
रात केशों में सिमटकर सो गई।
अरुन इंदीवर खिला, ईंगूर पराग भरा
सुनहले रूप के जल में
अलक्तक की बूंद
झिलमिल : स्फटिक के तल में।

Jagdish Gupt
About the poet

Jagdish Gupt

Jagdish Gupt (Hindi: डा. जगदीश गुप्त) (1924–2001) was a well-known poet of the Nayi kavita (नई कविता) generation, a period of Modernism in modern Indian Hindi poetry. He was chairman of the Department of Hindi at Allahabad University. Jagdish Gupta was born i…

View profile & all 15 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like

उंगलियांसुबह सुबह स्कूल जाते एक बच्चे के साथ हैंदादी बनकर— प्रताप सोमवंशीपांवभले ही खड़ी हो पूरी देह इन परपूजने के बहुतेरे प्रतीक जुड़े हों पांवों के साथ— प्रताप सोमवंशीमुनव्वर राना के शेरअब जुदाई के सफ़र को मिरे आसान करोतुम मुझे ख़्वाब में आ कर न परेशान करो— मुनव्वर रानामहफ़िल में आज मर्सिया-ख़्वानी ही क्यूँ न होमहफ़िल में आज मर्सिया-ख़्वानी ही क्यूँ न होआँखों से बहने दीजिए पानी ही क्यूँ न हो— मुनव्वर रानास्मृतिजैसे-जैसे उमर बढ़ती जाती है हमारे दिमाग़ में स्मृतियोंका ख़ज़ाना बनने लगता है। ख़ज़ाने में लगातार और-और— भगतसिंह सोनीहाथ पर हाथ धरेसूर्य तुमने मुझे अँधेरे में रखाबताया कुछ भी नहीं मुझे— भगतसिंह सोनी