तदुपरांत एक दिन
परियों की ओर ताकते हुए मैंने कहा,
तुम लोग अब चली आओ
चली आओ और भी ऊँची मंज़िल में;
नीचे है बडा झंझट,
वहाँ सिर्फ़ भीड़भाड़ ही रहती है,
सम्मन के बहाने प्यादा आकर
केवल परेशानियों ही बढ़ाता है;
मैं हूँ भिन्न हवा में सिहरित उत्तुंग पथिक
जहाँ पूर्ण चाँद बहुत नज़दीक—
शायद हाथ में ही!
चंपई, लाल, कत्थई और हरी परियाँ
चली आईं ऊपर की मंज़िल में।
कितना मीठा लगा कानों को
ताल-ताल पर बजते नूपुर।
हवा ने कितना सुख पहुँचाया!
परियों ने दी वासना गंभीर!
कामना को देख-देख
न जाने क्या जाग उठा था
और फिर वह जाग उठा इसी हृदय में।
इसे देख सभी बह गए!
प्रेम में कंटक है ईर्ष्या।
प्रेम बहुत ही हिंस्र और बर्बर!
चंपई लाल कत्थई—
हरी सुनहरी और हीरक
सभी थी उस मीना बाज़ार में।
क्योंकि, वे सभी है कामना की ही मणिमाला—
उन्होंने ही दिया प्रकाश अंधकार में।
मिट गया वह रूप।
फिर जीवन के नाना गत सत्यों में—
फिर-फिर लगी विचरने स्मृति
चिंतन की शक्ति को करती तीक्ष्ण!
कौन नवजन्म लेगा?
कौन देगा देखने की नई दृष्टि?
कौन हटा देगा निज के इस अहमय विघ्न को?
यह जो निशिदिन मेरुदंड को कुरेद रहा विष
कर दिया विषाक्त सुखी स्वत्व को
इतने में म्लान हँसी हँस
शुचि सेविका के वेश में
कपाल पर रक्खा हाथ—सत्य ने
और तब देखता हूँ एक अपूर्व
छाया-माया-आलोक अवतमसा के बीच
चल रहा निरंकुश
वह मानो अखिल-रूप।
वह क्या प्रेम?
वह क्या निर्लिप्त?








