गुलज़ार | शेर

GulzarGulzar18 Aug 1934

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आइना देख कर तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई
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आप के बा'द हर घड़ी हम ने
आप के साथ ही गुज़ारी है

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शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आप की कमी सी है

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ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा
क़ाफ़िला साथ और सफ़र तन्हा
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वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर
आदत इस की भी आदमी सी है
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कभी तो चौंक के देखे कोई हमारी तरफ़
किसी की आँख में हम को भी इंतिज़ार दिखे
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आदतन तुम ने कर दिए वादे
आदतन हम ने ए'तिबार किया
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जिस की आँखों में कटी थीं सदियाँ
उस ने सदियों की जुदाई दी है
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कितनी लम्बी ख़ामोशी से गुज़रा हूँ
उन से कितना कुछ कहने की कोशिश की
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हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं तोड़ा करते
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हम ने अक्सर तुम्हारी राहों में
रुक कर अपना ही इंतिज़ार किया
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कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है
ज़िंदगी एक नज़्म लगती है
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अपने साए से चौंक जाते हैं
उम्र गुज़री है इस क़दर तन्हा
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मैं चुप कराता हूँ हर शब उमडती बारिश को
मगर ये रोज़ गई बात छेड़ देती है
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तुम्हारे ख़्वाब से हर शब लिपट के सोते हैं
सज़ाएँ भेज दो हम ने ख़ताएँ भेजी हैं
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ख़ुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में
एक पुराना ख़त खोला अनजाने में
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कल का हर वाक़िआ तुम्हारा था
आज की दास्ताँ हमारी है
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Gulzar
About the poet

Gulzar

Sampooran Singh Kalra (born 18 August 1934), known professionally as Gulzar, is an Indian lyricist, poet, author, screenwriter, and film director. He started his career with music director S.D. Burman as a lyricist in the 1963 film Bandini and worked with man…

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