चेहरे पर आती हैं परछाइयाँ

Girija Kumar MathurGirija Kumar Mathur22 Aug 1919 – 10 Jan 1994

1 min read · 12.6K reads

चेहरे पर आती हैं परछाइयाँ
ये नई उम्र वाले गठीले बदन
ये नई काट के अंगबेधी वसन
हर सड़क पर
चटख रंग की बाढ़
बेफ़िक्र चलती हुईं
देहधारी शिखाएँ गरम
फूल की नोक चुभती निकलती हुईं

रुकी दृष्टि हटती
लिहाजों भरी सब्र करती, संभलती
धुरी छोड़ देती है लेकिन
शुरू से अधूरी, पियासी, थमी
कुछ पुराने खुमारों की गहराइयाँ
मेरे चेहरे पर आती हैं परछाइयाँ

उड़े तूफान पर
जब ज़रा हीरा आया
रुके, साँस ली
तेज़ जाती हुई एक झाँकी दिखी
स्वप्न-सी उम्र की
आँख झपकी
कि बदली समूची छटा दृश्य की
मंच घूमा
बिठा दर्शकों में गया

बीच अभिनय
अभी तो खड़े पात्र थे
भाव मुद्रा धरे
प्यार आधा किए

वक्ष आधे मिले
बाँह आधी उठी
बात आधी कही !

फिर यही है हवा
कासनी नीलिमा
फिर वही दुष्ट मौसम
शरम तोड़ता
फिर वही फूल पीले
नए घोंसले
फिर वही घास पर
धूप का हाशिया
फिर वही चाँदनी
तेज, उत्कट युवा
फिर अछूती डगर
उम्र उठता नशा

Girija Kumar Mathur
About the poet

Girija Kumar Mathur

Girija Kumar Mathur (Hindi: गिरिजाकुमार माथुर) (22 August 1919 - 10 January 1994) was a notable Indian writer of the Hindi language. He is noted for his translation of the popular English song "We Shall Overcome" into Hindi (हम होगें कामयाब). His father, Devi…

View profile & all 15 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like