मेरी तलवार है ये मेरा कलम

Gauhar RazaGauhar Raza17 Aug 1956

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एक नज़्म, एक गज़ल

उलझा, उलझा सा कोई

शेर कहीं

एक अफसाना, कहानी

या कोई एक किताब

कोई तस्वीर

कोई खाका

कोई एक ख्याल

दिल के एक कोने में कहीं

कलियों के चटकने की सदा

सुबह दम ओस में भीगे हुए

फूलों की महक,

दूर धुँधलाये हुए

रंगों के परदे से परे

डूबते और उभरते हुए

नगमों की सदा

गहरी आँखों में कहीं

आँसू छलकने से भी पहले का समाँ

 

गर कभी ऐसे ही

कुछ नर्म से जज़्बात को

अल्फाज़ का पैराहन दूँ

हथकड़ी हाथ में पड़ जाती है

और कागज़ पे किसी

पर्दा-ए-सीमीं की तरह

एक, एक कर के

उभरते हैं

हज़ारों चेहरे,

बैन करते हुए

बेआसरा, गुमनाम सवाल

पूछते हैं के ये इंसाफ

लहू में कब तक

 

तेरी तलवार है ये तेरा कलम

 

और फिर दिल के किसी कोने से

आती है सदा

कितने ही हाथ हैं जो

नर्म से जज़्बात रकम करते हैं

 

यह कलम तीशा-ओ-तलवार है

इन हाथों में

अमन-ओ-इंसाफ की

बेबाक तमन्ना के लिए

फिर से एक बार इसे वक्फ करो

Gauhar Raza
About the poet

Gauhar Raza

Gauhar Raza (born 17 August 1956) is an Indian scientist by profession, and a leading Urdu poet, social activist and documentary filmmaker working to popularize the understanding of science among general public, known for his films like Jung-e-Azadi, on the I…

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