खामोशी's image
2 min read

खामोशी

Gauhar RazaGauhar Raza
Share0 Bookmarks 1010 Reads

लो मैंने कलम को धो डाला

लो मेरी ज़बाँ पर ताला है

 

लो मैंने आँखें बंद कर लीं

लो परचम सारे बांध लिए

नारों को गले में घोंट दिया

एहसास के ताने बाने को

फिर मैंने हवाले दार किया

इस दिल की कसक को मान लिया

एक आखरी बोसा देना है

और अपने लरज़ते हाथों से

खंजर के हवाले करना है

 

लो मैंने कलम को धो डाला

लो मेरी ज़बाँ पर ताला है

 

इलज़ाम ये आयद था मुझ पर

हर लफ्ज़ मेरा एक नश्तर है

जो कुछ भी लिखा, जो कुछ भी कहा

वो देश विरोधी बातें थीं

और हुक्म किया था ये सादिर

तहज़ीब के इस गहवारे को

जो मेरी नज़र से देखेगा

वो एक मुलजि़म कहलायेगा

 

लो मैंने कलम को धो डाला

लो मेरी ज़बाँ पर ताला है

 

जो इश्क के नगमे गायेगा

जो प्यार की बानी बोलेगा

जो बात कहेगा गीतों में

जो आग बुझाने उट्ठेगा

जो हाथ झटक दे कातिल का

वो एक मुजरिम कहलायेगा

 

लो मैंने कलम को धो डाला

लो मेरी ज़बाँ पर ताला है

 

खामोश हूँ मैं सन्नाटा है

क्यों सहमे, सहमे लगते हो

हर एक ज़बाँ पर ताला है

क्यों सहमे, सहमे लगते हो

लो मैंने कलम को धो डाला

लो मेरी ज़बाँ पर ताला है

 

हाँ सन्नाटे की गूँज सुनो

हैं लफ्ज़ वही, अंदाज़ वही

हर ज़ालिम, जाबिर, हर कातिल

इस सन्नाटे की ज़द पर है

 

खामोशी को खामोश करो

यह बात तुम्हारे बस में नहीं

 

खामोशी तो खामोशी है

गर फैल गई तो फैल गई

 

No posts

No posts

No posts

No posts

No posts