राग: गौरी
तौलगि जिनि मारै तूँ मोहिं।
जौलगि मैं देखौं नहिं तोहिं॥टेक॥
इबके बिछुरे मिलन कैसे होइ।
इहि बिधि बहुरि न चीन्है कोइ॥१॥
दीनदयाल दया करि जोइ।
सब सुख-आनँद तुम सूँ होइ॥२॥
जनम-जनमके बंधन खोइ।
देखण दादू अहि निशि रोइ॥३॥
राग: गौरी
तौलगि जिनि मारै तूँ मोहिं।
जौलगि मैं देखौं नहिं तोहिं॥टेक॥
इबके बिछुरे मिलन कैसे होइ।
इहि बिधि बहुरि न चीन्है कोइ॥१॥
दीनदयाल दया करि जोइ।
सब सुख-आनँद तुम सूँ होइ॥२॥
जनम-जनमके बंधन खोइ।
देखण दादू अहि निशि रोइ॥३॥

Dadu Dayal ( 1544—1603) was a poet-sant , a religious reformator which have said against formalism and priestcraft.
View profile & all 15 Poems / Storiesदादू दीया है भला, दिया करो सब कोय।घर में धरा न पाइए, जो कर दिया न होय।
अजहूँ न निकसे प्रान कठोर .दरसन बिना बहुत दिन बीते सुंदर प्रीतम मोर.
घीव दूध में रमि रह्या व्यापक सब हीं ठौरदादू बकता बहुत है मथि काढै ते और
भाई रे! ऐसा पंथ हमाराद्वै पख रहितपंथ गह पुरा अबरन एक अघारा
तहाँ मुझ कमीन की कौन चलावै।जाका अजहूँ मुनि जन महल न पावै।।