है यह आजु बसन्त समौ, सु भरौसो न काहुहि कान्ह के जी कौ
अंध कै गंध बढ़ाय लै जात है, मंजुल मारुत कुंज गली कौ
कैसेहुँ भोर मुठी मैं पर्यौ, समुझैं रहियौ न छुट्यौ नहिं नीकौ
देखति बेलि उतैं बिगसी, इत हौ बिगस्यौ बन बौलसरी कौं।।
है यह आजु बसन्त समौ, सु भरौसो न काहुहि कान्ह के जी कौ
अंध कै गंध बढ़ाय लै जात है, मंजुल मारुत कुंज गली कौ
कैसेहुँ भोर मुठी मैं पर्यौ, समुझैं रहियौ न छुट्यौ नहिं नीकौ
देखति बेलि उतैं बिगसी, इत हौ बिगस्यौ बन बौलसरी कौं।।

Bihari Lal Chaube or Bihārī (1595–1663) was a Hindi poet, who is famous for writing the Satasaī (Seven Hundred Verses) in Brajbhasha, a collection of approximately seven hundred distichs, Kumar which is perhaps the most celebrated Hindi work of poetic art, as…
View profile & all 16 Poems / Storiesमाहि सरोवर सौरभ लै, ततकाल खिले जलजातन मैं कैनीठि चलै जल वास अचै, लपटाइ लता तरु मारग मैं कै
बौरसरी मधुपान छक्यौ, मकरन्द भरे अरविन्द जु न्हायौमाधुरी कुंज सौं खाइ धका, परि केतकि पाँडर कै उठि धायौ
जाके लिए घर आई घिघाय, करी मनुहारि उती तुम गाढ़ीआजु लखैं उहिं जात उतै, न रही सुरत्यौ उर यौं रति बाढ़ी
खेलत फाग दुहूँ तिय कौ मन राखिबै कौ कियौ दाँव नवीनौप्यार जनाय घरैंनु सौं लै, भरि मूँठि गुलाल दुहूँ दृग दीनौ
नील पर कटि तट जटनि दै मेरी आली,लटुन सी साँवरी रजनि सरसान दै,