बहुत देर बाद
मन के पेड़ से
पत्ते झड़ने के बाद पूछना
कि घायल मौसमों में खड़े
पेड़ के पत्तों का रंग
ख़ुद से उदास तितली की
हथेली छूने के बाद
कैसा होता है
मेरी मायूसी उपरामता-सी
जिसके समंदर में
जल तुम्हारी बेपरवाही की
नदी में से गिरता है
मेरी ख़ामोशी-सा
जिसके उखड़े पेड़ पर
अब तुम काग़ज़ की
चिड़िया बिठाती
या मेरे जैसा
जिसके अस्तित्व की नाव में
तूने चारों कोनों से फटी
चुनरी का बादबां बनाया है
यों हँसा न करो
जोगियों के घाव
पीरों की दरगाह-से होते हैं
मेरी उदासी की
लय का नशा,
तुम नहीं समझ सकती।








