बरषा सिर पर आ गई हरी हुई सब भूमि
बागों में झूले पड़े, रहे भ्रमण-गण झूमि
करके याद कुटुंब की फिरे विदेशी लीग
बिछड़े प्रीतमवालियों के सिर पर छाया सोग
खोल-खोल छाता चले लोग सड़क के बीच
कीचड़ में जूते फँसे जैसे अघ में नीच
बरषा सिर पर आ गई हरी हुई सब भूमि
बागों में झूले पड़े, रहे भ्रमण-गण झूमि
करके याद कुटुंब की फिरे विदेशी लीग
बिछड़े प्रीतमवालियों के सिर पर छाया सोग
खोल-खोल छाता चले लोग सड़क के बीच
कीचड़ में जूते फँसे जैसे अघ में नीच

Bhartendu Harishchandra (9 September 1850 – 6 January 1885) is known as the father of modern Hindi literature as well as Hindi theatre. He is considered one of the greatest Hindi writers of modern India. A recognised poet, he was a trendsetter in Hindi prose-…
View profile & all 49 Poems / Storiesनिज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूलबिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।
रोअहू सब मिलिकै आवहु भारत भाई।हा हा! भारतदुर्दशा न देखी जाई॥ धु्रव॥
चूरन अलमबेद का भारी, जिसको खाते कृष्ण मुरारी।।मेरा पाचक है पचलोना, जिसको खाता श्याम सलोना।।
चना जोर गरम।चना बनावैं घासी राम। जिनकी झोली में दूकान।।
सीटी देकर पास बुलावै।रुपया ले तो निकट बिठावै॥