हरी हरी दूब पर ओस की बूंदे अभी थी

Atal Bihari VajpayeeAtal Bihari Vajpayee25 Dec 1924 – 16 Aug 2018

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हरी हरी दूब पर 

ओस की बूंदे 

अभी थी, 

अभी नहीं हैं| 

ऐसी खुशियां 

जो हमेशा हमारा साथ दें 

कभी नहीं थी, 

कहीं नहीं हैं| 


क्‍कांयर की कोख से 

फूटा बाल सूर्य, 

जब पूरब की गोद में 

पाँव फैलाने लगा, 

तो मेरी बगीची का 

पत्ता-पत्ता जगमगाने लगा, 

मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूं 

या उसके ताप से भाप बनी, 

ओस की बूंदों को ढूंढूं? 



सूर्य एक सत्य है 

जिसे झुठलाया नहीं जा सकता 

मगर ओस भी तो एक सच्चाई है 

यह बात अलग है कि ओस क्षणिक है 

क्यों न मैं क्षण क्षण को जिऊं? 

कण-कण में बिखरे सौन्दर्य को पिऊं? 


सूर्य तो फिर भी उगेगा, 

धूप तो फिर भी खिलेगी, 

लेकिन मेरी बगीची की 

हरी-हरी दूब पर, 

ओस की बूंद 

हर मौसम में नहीं मिलेगी।

Atal Bihari Vajpayee
About the poet

Atal Bihari Vajpayee

Atal Bihari Vajpayee was an Indian politician, statesman and a poet who served three terms as the Prime Minister of India, first for a term of 13 days in 1996, then for a period of 13 months from 1998 to 1999, and finally, for a full term from 1999 to 2004. A…

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