अख़बार - अनुज लुगुन

अनुज लुगुनअनुज लुगुन10 Sept 1986

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मेरे कमरे में पुराना अख़बार
हवा के झोंके से फड़फड़ा रहा है

शायद वह कह रहा है
कि उसे पहुँचा दिया जाए
विज्ञापन कम्पनियों के यहाँ
जिन्होंने उसके चेहरे पर
झूठ का रंगपोत दिया है
या, वह कह रहा है
कि उसे पहुँचा दिया जाए
उन विद्रोहियों के यहाँ जंगल में
जिनसे मुठभेड़ की ख़बर छपी है

मैं चुपके से उठता हूँ
और धीरे से अख़बार को
काठ की तख़्ती से दबा देता हूँ ।
अनुज लुगुन
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अनुज लुगुन

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