जग बदल घालूनी घाव

Annabhau SatheAnnabhau Sathe1 Aug 1920 – 18 Jul 1969

1 min read · 38.1K reads

जग बदल घालूनी घाव । सांगुनी गेले मज भीमराव ।।
गुलामगिरीच्या या चिखलात । रुतुन बसला का ऐरावत ।।
अंग झाडूनी निघ बाहेरी । घे बिनीवरती घाव ।।
धनवंतांनी अखंड पिळले । धर्मांधांनी तसेच छळले ।।
मगराने जणू माणिक गिळीले । चोर जहाले साव ।।
ठरवून आम्हा हीन अवमानीत । जन्मोजन्मी करुनी अंकित ।।
जिणे लादून वर अवमानीत । निर्मुन हा भेदभाव ।।
एकजुटीच्या या रथावरती । आरूढ होऊनी चलबा पुढती ।।
नव महाराष्ट्रा निर्मुन जगती । करी प्रगट निज नाव ।।

Annabhau Sathe
About the poet

Annabhau Sathe

Tukaram Bhaurao Sathe (1 August 1920 – 18 July 1969), popularly known as Annabhau Sathe, was a social reformer, communist folk poet, and writer from Maharashtra, India. Sathe was a Dalit born into the untouchable Mang community, and his upbringing and identit…

View profile & all 3 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like

प्रधानमंत्री जीअगर यह भी तय हो जाए कि अब से मूर्तियाँ ही तोड़ी जाएँगी दंगों में,मैं इस तोड़-फोड़ का समर्थन करूँगा।— फ़रीद ख़ाँहम भारत के लोगमैं चूँकि नागरिक हूँ अपने देश का।मैं देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन हूँ।— फ़रीद ख़ाँदफ़्तरमेरे घर से दफ़्तर की दूरीअलग-अलग जगह रहने वाले मेरे सहकर्मियों के लगभग बराबर— हरे प्रकाश उपाध्यायजिन चीज़ों का मतलब नहीं होगामैं भारत में नहीं रहता हूँमैं अपने घर में रहता हूँ— हरे प्रकाश उपाध्यायमेरी यह सोचनिस्बतन मेरी यह सोच बन गईमैं एकदम घुन्ना हो गया— लीलाधर मंडलोईगाँव की उदासी का गीतकहीं चले गए हैं पेड़ की डाल से पंछीउदास हो-होकर— अरुणाभ सौरभ