मुश्किल है उन के रुख़ पे ठहरना नक़ाब का's image
0219

मुश्किल है उन के रुख़ पे ठहरना नक़ाब का

ShareBookmarks

मुश्किल है उन के रुख़ पे ठहरना नक़ाब का

बढ़ने लगा है जोश मिरे इज़्तिराब का

ऐ आसमान देख सितम कोई रह न जाए

मैं याद क्या करूँगा ज़माना शबाब का

सर का के मेरे मुँह से कफ़न कह रहे हैं वो

शिकवा था क्या तुम्हीं को हमारे हिजाब का

दुनिया का ज़र्रा ज़र्रा बदलता है करवटें

सब पर असर है इक दिल-ए-पुर-इज़्तिराब का

हाँ देख 'अब्र' आह तिरी काम कर गई

सरका रहे हैं रुख़ से वो गोशा नक़ाब का

Read More! Learn More!

Sootradhar