उपदेशसाहस्री / उपदेश ५

Aadi SankaracharyaAadi Sankaracharya

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उपदेशसाहस्री / उपदेश ५ /
मूत्राशञ्को यथोदञ्को नाग्रहीदमृतं मुनिः।
कर्मनाशभयाज् जन्तोरात्मज्ञानाग्रहस्तथा॥

बुद्धिस्थश्चलतीवात्मा ध्यायतीव च दृश्यते।
नौगतस्य यथा वृक्षास्तद्वत् संसारविभ्रमः॥

नौस्थस्य प्रातिलोम्येन नगानां गमनं यथा।
आत्मनः संसृतिस्तद्वद् ध्यायतीवेति हि श्रुतिः॥

चैतन्यप्रतिबिम्बेन व्याप्तो बोधो हि जायते।
बुद्धेः शब्दादिनिर्भासस्तेन मोमुह्यते जगत्॥

चैतन्याभासताहमस्तादर्थ्यं च तदस्य यत्।
इदमंशप्रहाणे न परः सोऽनुभवो भवेत्॥

Aadi Sankaracharya
About the poet

Aadi Sankaracharya

आदि शंकराचार्य (५०८ ईसा पूर्व) भारत के एक महान दार्शनिक एवं धर्मप्रवर्तक थे। उन्होने अद्वैत वेदान्त को ठोस आधार प्रदान किया। उन्होने सनातन धर्म की विविध विचारधाराओं का एकीकरण किया। उपनिषदों और वेदांतसूत्रों पर लिखी हुई इनकी टीकाएँ बहुत प्रसिद्ध हैं। इन्होंने…

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