उपदेशसाहस्री / उपदेश २

Aadi SankaracharyaAadi Sankaracharya

1 min read · 12.8K reads

उपदेशसाहस्री / उपदेश २
प्रैषेद्धुमशक्यत्वान् नेति नेतीति शेषितम्।
इदं नाहमिदं नाहमित्यद्धा प्रतिपद्यते॥

इदंधीरिदमात्मोत्था वाचारम्भञगोचरा।
निषिद्धात्मोद्भवत्वात् सा न पुनर्मानतां व्रजेत्॥

पूर्वबुद्धिमबाधित्वा नोत्तरा जायते मतिः।
दृषिरेकः स्वयंसिद्धः फलत्वात् स न बाध्यते॥

इदंवनमतिक्रम्य शोकमोहादिदूषितम्।
वनाद् गन्धारको यद्वत् स्वमात्मानं प्रपद्यते॥

Aadi Sankaracharya
About the poet

Aadi Sankaracharya

आदि शंकराचार्य (५०८ ईसा पूर्व) भारत के एक महान दार्शनिक एवं धर्मप्रवर्तक थे। उन्होने अद्वैत वेदान्त को ठोस आधार प्रदान किया। उन्होने सनातन धर्म की विविध विचारधाराओं का एकीकरण किया। उपनिषदों और वेदांतसूत्रों पर लिखी हुई इनकी टीकाएँ बहुत प्रसिद्ध हैं। इन्होंने…

View profile & all 16 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like