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हे धर्मराज, मेरी गुहार सुनो

नवल किशोर कुमारनवल किशोर कुमार
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जीवन की गोधूलि बेला में,
अब जीने को चंद साँसे हैं,
बंद होते असहज पलकों पर,
सजीव आँसुओं के चंद बूँदें हैं।

 

बचपन सुहाना, पथरीली जवानी,
वो बीते लम्हें याद आते हैं।
मजबूत हाथों की वो मजबूरियाँ,
अंतर्मन में आग लगाते हैं।

 

गाँव की हरी-भरी वादियों में,
फिर से चिल्लाने को जी करता है।
बू

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