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4 sher
दिल्ली में अपना था जो कुछ अस्बाब रह गयाइक दिल को ले के आए हैं उस सरज़मीं से हम
इन दिनों गरचे दकन में है बड़ी क़द्र-ए-सुख़नकौन जाए 'ज़ौक़' पर दिल्ली की गलियाँ छोड़ कर
दिल्ली हुई है वीराँ सूने खंडर पड़े हैंवीरान हैं मोहल्ले सुनसान घर पड़े हैं
दिल की बस्ती पुरानी दिल्ली हैजो भी गुज़रा है उस ने लूटा है