
जिस मंच पे कविता बुलवाई गई हो, और फिर बोले “पैसे दे वरना चुप रह”,
वो मंच नहीं ...... दुकानदारी है।
क्या बिना प्राइम मेम्बरशिप लिए कहीं कुछ लिख कर नही दिया जा सकता यहां
योग दिवस पर चंद शब्द
आख़िर क्यों ये योग मेरे मन को सुकून देता है...?
आज योग पर कविता लिखने का मौका है,
और मेरा ये मन
मेरी आत्मा को जुनून देता है।
ख़ास बात ये है कि योग में इंसानियत है,
यहाँ कोई भेदभाव नहीं है धर्मों का।
योग तो शरीर और आत्मा आख़िर क्यों ये योग मेरे मन को सुकून देता है...?
आज योग पर कविता लिखने का मौका है,
और मेरा ये मन — मेरी आत्मा को जुनून देता है।
ख़ास बात ये है कि योग में इंसानियत है,
यहाँ कोई भेदभाव नहीं है धर्मों का।
योग तो शरीर और आत्मा — दोनों की शांति है...
और आज यह लिखना भी
मेरे कर्मों का ही एक खेल है।
दोनों की शांति है...
और आज यह लिखना भी
मेरे दिल रूपी की एक क्रांति है।
