मैं भी तो चाहती थी,

कि...

कोई खामोशी समझे मेरी।

जब कुछ भी न कहूं मैं,

तब वो उस चुप्पी की वजह पूछे मेरी।

कई दिनों तक जब लापता सी रहूँ मैं,

तब वो मुझे ढूँढने गालियों में आए मेरी।

मैं भी तो चाहती थी,

कि...

कोई रूह से जुड़ जाए मेरी।

कि जब भी उदास रहूं मैं,

या मुश्किल कोई आन पड़े जो मुझ पर

तब वो जान जाए बिना कुछ कहे मेरे।

और कह सकूं मैं सब कुछ जिससे

बिना किसी हिचकिचाहट के।

कि...

मैं भी तो चाहती थी,

मुझे भी..

मिल जाए मीत, मन का कोई।

Pratibha Singh Kuch Ankahe Alfaaz ????