अजीब ढंग हैं अबके बहार आने के
चमन में चार सू चर्चे हैं घर जलाने के
वो तेज़ आँधी गुलिस्ताँ में अबकी बार चली
के तिनके भी ना रहे मेरे आशियाने के
तू बवफा भी रहा और कभी वफा भी ना की
मैं सद्क़े जाऊं तेरे इस हसीं बहाने के
इलाही खैर के होता है हुस्न भी रुसवा
जमाने भर में हैं चर्चे मेरे फसाने के
ये इंक़िलाब की आहट है रेख़्ता साहिब
वरक़ पलटने ही वाले हैं अब फसाने के
Rekhta Pataulvi
