ख़ुदा इश्क़ वहीं पैदा कर जहाँ

जमानें की बनायीं दीवारें बीच में न आयें।

वह इश्क़

जो शादी में नहीं बदल सकता

एक नाजायज़ सबंध बनके रह जाता हैं।

कब तक इश्क़ अंधा रखें,

क्यूँ न अब इश्क़ देख-परख के किया जाये?

घरौंदें दिलों के टूटे तो टूटे

ज़ात मज़हब क़ायदों की दीवारें न टूटे।

इश्क़ रहें न रहें यहाँ

रिवाजों का बनें रहना ज़रूरी हैं।


०९-०३-२०२१

@Zazabor72