तोड़ ज़ंजीरें गुलामी की, था ध्वज़ जो हमने फ़हराया। लाखों अरमानों के क़ुर्बानी से, था जन गण हमने दोहराया।। हर मगन दिल है झूम उठता, सुन कर जन गण भारत का। ऊँची गगन चूम लहराता, तिरंगा मेरे भारत का।। इंद्रधनुष में उतने रंग कहाँ? जितने इस देश में तहज़ीबें रहतें हैं। कुछ होगें यहाँ कलेश मगर, हर दिल में प्रेम ही तो बस्तें हैं।। निरपेक्षता की ताकत लेकर, युद्ध विशाल रोका था हमने। कुछ न होने की संकल्पना को, शून्य बना कर दिया था हमने।। यह देश है धरती मेधा की, हर मत में कौटिल्य रहता है। यह देश है धरती त्यागों की, हर माटी में माँझी बस्ता है।।