क्यूँ ख़फ़ा ख़फ़ा से रहते हो मेरी इन बचकानी बातों से ? वो वक़्त बीते हुए अभी दिन नहीं जब इन पर ही हस्ते थें।

दिन बदलें कई शामें बदलीं , पर दिल टुटा जब आप बदलें , क्या वो पल कभी याद आतें हैं , जब संग कसमे हम खाते थें?

क्यूँ ख़फ़ा ख़फ़ा से रहते हो मेरी इन बचकानी बातों से ? वो वक़्त कभी कुछ ऐसा था जब आप इनपर ही मरते थे।

कहते थे बड़े प्यारे लगते हो , साथ कभी न छोड़ोगे । वो दिन कभी जो याद आती , हर बातें बचकानी होतें थें ।

क्यूँ ख़फ़ा ख़फ़ा से रहते हो मेरी इन बचकानी बातों से ? वो पल की याद सतातीं हैं जो संग आपके बिताये थें।

क्या हुआ वो सारे वादों का , क्या खता थी उन इरादों का ? नफ़ा ये दिल का हो न सका ,धरकन तो आपसे ही चलतें थें।

क्यूँ छूटा है अब साथ तेरा ? क्यूँ रूठा है अब दिल ये मेरा ?

क्यूँ ख़फ़ा ख़फ़ा से रहते हो मेरी इन बचकानी बातों से ?