हर डगर हर आस में वो आवाज़ होनी चाहिए ,
सूखे हलक़ सी ही कोई प्यास होनी चाहिए।

हर उस हक़ के ख़ातिर, अपने उनके सबके खातिर ,
धीमी ही सही पर हर तरफ यह शोर होनी चाहिए।

झूठे ख़बरों ,अखबारों में दब कर मर गये जो ,
हर उस क़ब्र से भी इक कल्पना निकलनी चाहिए।

चुप भी हैं तो क्या हुआ खामोश तो हम हैं नहीं ,
इस ज़माने को पुकारती बस सोच होनी चाहिए।

कितने रूठे, कितने टूटे, कितने हमसब अलग हैं बैठे ,
लेकिन आवाज़ गगन में, स्वर में उठनी चाहिए।