काली घनी सी रात में ,
काल सा वो बढ़ गया ।
तुझे रोकना था जिसे ,
वो तेरे मस्तक चढ़ गया ।।
कर रहा दमन तू उनपर ,
जो हताश बैठे सह गए ।
देना है हिसाब सबका ,
जो आंसुयें है बह गए ।।
छल कपट से घिरे ,
कोटि कोटि भर गए ।
तेरे काँधे पर टिके ,
भार सत्य के गिर गए ।।
इक कदम तू बढ़ा ,
ले आज तू इक सपत ।
करदे तू नाश उनका ,
जो पाप आरहे निकट ।।
है युद्ध की पुकार ये ,
नगाड़ सुन बज गए ।
खुद को तू संभाल ले ,
रणभूमि देख सज गए ।।
हर इक स्वर तू सुन ,
ये आत्मा की दहाड़ को।
भीतर दबे ज्वाला से ,
पिघला दे तू पहाड़ को ।।