काली घनी सी रात में , काल सा वो बढ़ गया । तुझे रोकना था जिसे , वो तेरे मस्तक चढ़ गया ।। कर रहा दमन तू उनपर , जो हताश बैठे सह गए । देना है हिसाब सबका , जो आंसुयें है बह गए ।। छल कपट से घिरे , कोटि कोटि भर गए । तेरे काँधे पर टिके , भार सत्य के गिर गए ।। इक कदम तू बढ़ा , ले आज तू इक सपत । करदे तू नाश उनका , जो पाप आरहे निकट ।। है युद्ध की पुकार ये , नगाड़ सुन बज गए । खुद को तू संभाल ले , रणभूमि देख सज गए ।। हर इक स्वर तू सुन , ये आत्मा की दहाड़ को। भीतर दबे ज्वाला से , पिघला दे तू पहाड़ को ।।