संसार के मस्तक पर चढ़ कर , मैं जन गण का गान करू। यमुना के तट पर खड़ा , मैं भारत का गुण गान करू।। सात समंदर पार भी , मैं हिन्दुस्तान का मान करू। चन्द्रमा हो या हो मंगल , झंडे गाड़ अभिमान करू।। जो सदा सिखाता देश हमारा , हर मानव का सम्मान करू । चाणक्य हो या हो द्रोणा , हर शिक्षक को शिर्ष प्रणाम करू।। पर्वत हो जिसका शीश मुकुट , मैं कैसे न उस पर अभिमान करू। संसार के मस्तक पर चढ़ कर , मैं कैसे न जन गण का गान करू।।