तेरी रेखा कृति देख कर ,
हमने तो यह जाना है ।
अपने मन को लेखकर ,
तुमने मानवता को बाँटा है ।।
क्यों काटी तम ने ये सरहद ,
क्यों तमने धरती है बाँटी ।
नदियाँ पर्वत सब बाँट दिए ,
अपने मतलब के भाँती ।।
आँखों में भर कर आँसू ,
एक बार तो मेघा भी बोली ।
बाँटी तो फिर भी बाँटी ,
क्यों बाँटी लड़ने को गोली ।।
रंग दिए इन खेतों को ,
नीली पीली कई रंगों से ।
अम्बर भी देख अब बँट गए ,
उन उड़ते लहराते पतंगों से ।।