
जीवन शृंखला कभी श्रृंग कभी गर्त सी रही है
क्षणिक सुख क्षणिक दुख सी रही है
आवेग आवेश आशंकित अचंभित
किन्तु शून्य से कदाचित विचलित रही है
कदाचित किसी सम्मात्रिक छंद सी
कदाचित पंक्तिविहीन रही है
परीक्षित प्रतीक्षित प्रकाशित प्रतिबंधित
किन्तु शून्य से कदाचित विचलित रही है
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