जीवन शृंखला कभी श्रृंग कभी गर्त सी रही है 

क्षणिक सुख क्षणिक दुख सी रही है 

आवेग आवेश आशंकित अचंभित 

किन्तु शून्य से कदाचित विचलित रही है 

कदाचित किसी सम्मात्रिक छंद सी 

कदाचित पंक्तिविहीन रही है 

परीक्षित प्रतीक्षित प्रकाशित प्रतिबंधित 

किन्तु शून्य से कदाचित विचलित रही है 

कदाचित सौंदर्य अलंकार सी 

कदाचित शब्द विहीन रही है 

निर्वाचित निर्मित निसहाय निलंबित 

किन्तु शून्य से कदाचित विचलित रही है 

क्षणिक स्वप्निल चिर यथार्थ रही हैं 

उपेक्षित अपेक्षित अधिकृत आकर्षित 

कदाचित शून्य से विचलित 

किन्तु शून्य की प्रतिद्वंदी रही है l 


- युक्ति