एक छोर पकड़े

दूसरा छूट जाए

खींचती है जिंदगी

जाए तो कहां जाए

अपने ही चुने

फैसलों के जाल है

बाहर भी तो कैसे आएं

निशान भी न छोड़े

किसी मोड़ पर

उनको ढूंढते हुए

लौट जाए

तुम्हीं तो थे एक

घर का वो पुराना खूंटा

जंगल नापने में

तुम्हें भी भी छोड़ आए