अनहद की तलब ऐसी लगी

मयस्सर जिन्दगी से खफा बेहद हो गए !

हरियाली की हद पर बैठे

हिमायती बेदरख्त !!

है कसूर सिर्फ इतना की सपना था सच्चा ।

और साथ जो थे सपने में !

कुछ बुजदिल,कुछ मौकापरस्त हो गये !!


तभी तो कहता हूँ ।

की कीमत क्या है ? ख़्वाहिशों की तुम्हारी !

जरा बताते जाना

बिक जाता हूँ आज ही

कल किसी और कि बोली न लगवाना !!


हे ! न्याय मंदिर के मठाधीशों ।

राजनीति के मतवालों ।

कानून के बिक़वालो ।

सत्ता के चारण-भाटो

कुर्सी है ये जनता की ,और हो तुम चारो पाए ।

धरोहर,निरीह मानस की आपस मे ही बांट आये ।।


कारवां बना तुम्हारे लिए चलते रहे लोग समर्थित ।

भरोसे में नेतृत्व तुम्हारा,और कारवां ही लूट आये ?

यथार्थ तुम्हारी है जिम्मेदारी

पर सब्जबाग तुमने दिखलाए !!


पर अब जो हो रहा ! बिन दवाएं दर्द मयस्सर

बदल देंगे इतिहास भी ये !

जब अपनी पे आ जाये !!


~युगल किशोर


*अनहद = जिसकी कोई हद नही ।

*मयस्सर =मिलना, प्राप्त होना ।

*हिमायती बेदरख्त = हरियाली के विपरीत

*सब्जबाग= झूठी आशा देना