मेरी बालकनी पर अब कोई कबूतर नही आता , मेरे घर उसका कोई ख़त नही आता , वो जो लिख के छोड़ दिए थे बिस्तर के नीचे , उन पर रोना आता हैं कोई इश्क़ नही आता

वो लड़की जो मेरे साथ रहती थी , अपना दुपट्टा छोड़ कर गयी हैं , उसको रिस्ता तोड़ना आता हैं , मग़र मिटाना नही आता , वो जिन रास्तों से आती थी मुझे मिलने , अब उन रास्तों से कोई नही आता 

उसका ताल्लुक़ जिस जंगल से रहा हैं , उसमे शज़र बूढ़े नही होते , नदियां दोमुंही होती हैं , माटी से बदन रँगे जाते हैं , राते सोती नही लोरिया गाती हैं , दिन बंजारे भटकते रहते हैं , फूल इत्र बनाते हैं , तितलियां फूलो के ख़ातिर बदन उतार देती हैं , वहाँ कोई चाँद तारे नही होते लड़किया जुगनू पकड़ने में रात गुजार देती हैं , उस जंगल में कोई लड़का नही रहता हैं , उधर कोई फ़ोन नही बजता , कबूतर दोस्त होते हैं , जिनके पैरो में बंधे ख़त गाँव आते हैं , गाँव के लड़को की जवानी अपने नाम के ख़त के इंतजार में गुजर जाती हैं , शायद मेरे महबूब का ब्याह हो गया किसी शज़र से , या उसके बदन की उम्र हो गयी होगी , की मेरे ख़ातिर अब उस और से कोई नही आता , अब मेरे घर उसका कोई ख़त नही आता...!!

- Yug Dave