हीनता समेटे अपने रंग में

खुदसे रूठ कर बैठा है

आत्म संदेह से मुँह सीए अपना बादल 

मिलान ज्ञान का कर रहा है

बरसो से चला अपना रस्ता नापे

मन की दो बातों से

प्रमाण ढूंढे - गलती जांचे

आँधी के दो आरोपों से

अपनी कांच की बूंदो ने

चरित्र रूप से जांचा है उसका 

व्यक्तित्व के टांको से पौरुष रिस रहा है।

खुद की ऊंचाइयों में सम्हल कर

समय की धुनकी में पोली कपास धुन रही है 

वंही अपनी रोपी आस में 

धान खुशी में सो रही है।

शायद यही कारण है

इस साल वर्षा कम हो रही है।