कल जो हुआ उसे भूल नहीं पाया,

     उससे पहले ही कल क्या होगा? ने सताया।

फिर 'कल जो हुआ सो हुआ' से दिल बहलाया,

     लेकिन कल-कल करते हुए कल ने फिर डराया।

अचानक 'कल जो होगा देखा जायेगा' से हौंसला भी आया,

लेकिन वो कल आज तक भी नहीं आया।।

कल जो था या कल जो आएगा...

     उसने हर आज को भी बहकाया।।


अब सोचता हूँ कि इस आज और कल के चंगुल से छूटकर क्यूँ न हमेशा के लिए अनन्त, असीम एवं अन्तिम तक चला ही जाऊँ।।।