"प्रेम" घर नहीं है,अपितु कई सारे दरवाजों का घर है
वो भी खुले हुए!!
जिसमें हर कोई ठहर नहीं पाया, डर से!
समाज के थपेड़ों के डर से,
तमाशबीनों के तमाशों के डर से,
प्रेमी- प्रेमिका का आकर्षण
ही बना रहा हमेशा से पोषण - स्त्रोत
इस घर की नींव का।
ना जाने कितनी ही गुंथी हुई कहानियों की सुगंध से महकता रहा है यह घर,
जिसमे कुछेक कहानियां हवा के थपेड़ों से
तो कुछेक कहानियां परंपराओं के बोझ के थपेड़ों से हवा का साथ देती हुई अधूरी दास्तां बन कर रह गई.......
और शेष बची हुई कहानियां जो रुकी रह गई थी उस घर में
वो उस घर की दीवार में धंस गई
उस खूंटी की भांति,
जिसपे टंगा रहता है आज भी
आकांक्षाओं,
उम्मीदों
और
भावनाओ का कैलेंडर।
वास्तविकता में यहीं कहानियां प्रेम के अमरत्व के अधीन हो पाई क्योंकि चिरकाल समय तक कालजयी होने की भूमिका
को संपूर्णता इन्होंने ही प्रदान की...आकांक्षाओं और उम्मीदों की खूंटी बनकर।
यह खूंटी आज भी धंसी हुई है सामाजिकता के वक्षस्थल में, अब निर्भर करता है उठाई गई विद्रोह की आवाज़ पर।
सभी प्रेम कहानियों को अमरत्व के कटघरे में खड़े होकर प्रेम कहानियों के अमरत्व के लिए विद्रोह की आवाज़ को अपनी ढाल बनना होगा तभी सामाजिकता का नग्न वक्षस्थल ढका जाएगा आजादी के कपड़ों से।
©योगेश्वर स्वामी

