मन है अँधेरे में और दुखी हूँ मैं,
फिर भी मुस्कुराने का दिखावा कर रहा हूँ।
क्रुद्ध हूँ कलुषित हूँ और आशंकित हूँ मैं,
फिर भी तन मन है स्वच्छ ये दिखावा कर रहा हूँ।
हिमालय सा एकांत चाहता हूँ,
घने जंगल सा अँधेरा चाहता हूँ,
मन है बहुत विचलित रोना चाहता हूँ मैं।
कुछ खोना चाहता हूँ कुछ पाना चाहता हूँ,
ऐ भगवन मेरे अकेले रहना चाहता हूँ मैं।
छोड़ दो मेरे हाल पे यूँ ही,
न चाहूँ किसी से दिलासा पाना मैं,
एक बार अपनी आँखों से घनी बरसात चाहता हूं।
बहुत लगी है ठेस इस कलेजे में,
ठोकरें खाकर गिरना और संभलना चाहता हूँ।
हाँ मैं मरना चाहता हूँ,
पापों संग अग्निमय होकर शिव का भस्म बनना चाहता हूँ।
बंध कर जीने की आदत नहीं है मेरी,
जीवन की हर जंजीर को तोडना चाहता हूँ।
असफलताएं बहुत हैं मेरी वही उजागर हो रही हैं,
मगर मक़सद है मेरा भी कुछ उन्ही के लिए टूटकर जूझना चाहता हूँ।
तड़पना चाहता हूँ तरसना चाहता हूँ,
है बूँद बाकी उसे बहाना चाहता हूँ ,
कुछ समय अभी भी है किताब में मेरे,
भरकर उन्ही पन्नों को जीना चाहता हूँ।