अंत एक-सा सबका होवे,
राजा हो या रंक।
आगे चमक रहा सूरज है,
पीछे उसके पंक।
आज चमन-सा खिला है कोई,
कल है काली रात।
जीवन किसी के लिए वरदान,
किसी के लिए अभिशाप।
कोई शिखर छू रहा है, देखो,
किसी के पाले में खाई।
कोई बीच भँवर में भटके,
कोई फिसले बन काई।
आज मंथरा रहती घर-घर,
राम को देना चाहे वन।
अब कौशल्या कौन यहाँ है?
भरत छीन रहे सिंहासन।
भाई-भाई के दुश्मन बनकर,
लाँघ गए सब मर्यादा।
नेता इधर-उधर बतलाते,
भूल गए अपना वादा।

