बचपन से बाहर आने पर

बड़ा होने के बोध के साथ ही

हम सबसे पहले करते हैं

अपनी हंसी के बजट मे कटौती

हम बारीकी से कुतर देते हैं

उन तथाकथित 

सभ्य स्थानों से हंसी

जंहां पर हंसना 

किसी अलिखित अपराध की 

श्रेणी मे आता है

जबकि बाहर आते ही

उन सभ्य स्थानों से

हम सबसे पहले ढीली करते हैं 

अपनी टाई

जाहिर करते हैं अपनी चिढ़न

उस सभ्यता के उबाऊ

बनावटीपन पर

और लालच से देखते हैं

सड़क किनारे चाय की दुकान पर

खिलखिलाती मस्त नुक्कड़ को

जहां हंसी के किसी भी शब्द पर

सभ्यता के डण्डे की

नोक नही है ।