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ग़ज़ल


दूर ही छिटकी रही हमसे खुशी,हमें ऊंचे चाहिये थे ओहदे।

हंसी की थी ही नहीं गुंजाइशें,सख्त थे थोड़े वहां के क़ायदे।

दौड़ मे छूटी पुरानी यारियां,लौटने के क्या भला अब फ़ायदे।

मैं तुम्हारे काम का हूं या नहीं,सोच लेना तो ही करना वायदे।

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