अब तो कुर्सी के लालच में, मौन व्रत को भंग करो जागो भरत वंश वालों, दुश्मन से अब जंग करो अब तो गीत सुनाओं तुम भी, बंदूकों की गोली के अब तरकश में तीर चढ़ाओ, खुद्दारी की बोली के बेमानी की हदबंदी को, कब तक ढोना और पड़ेगा वीरों की माताओं को, कब तक रोना और पड़ेगा कितना ही तो खून बहा है, शान्ति की अभिलाषा में अब देशद्रोहियों को समझाओ,बंदूकों की भाषा में सब मुमकिन है दुनिया में, यही बताने निकला हूँ कान दबा के सोये हैं जो, उन्हें जगाने निकला हूँ
सच्चाई और इच्छाओं पे, आखिर इतने पहरे क्यूँ तब से मौनी बाबा बन के बैठे, बाबू इतने बहरे क्यूँ सिंघासन के मद में हो, या और किसी अभिलाषा में हमें बहरों को समझाना आता भगत सिंह की भाषा में दोगली बोली बन्द करो और सिंहो जैसे काम करो दशों दिशाओं में बाबूजी, भारत माँ का नाम करो एक इजाजत दो सेना को, गद्दारों पर वार करो अबके ये वाला मुद्दा तो, आर करो या पार करो बुद्ध नहीं, युद्ध ही हल है, यही जताने निकला हूँ कान दबा के सोये हैं जो, उन्हें जगाने निकला हूँ ।